ऋषि भूमि भारत पर कई बार यहाँ की संस्कृति
को समाप्त करने के उदेश्य से बाहरी आक्रमण हुए। यहाँ की संस्कृति व सभ्यता
की रक्षा हेतु समय-समय पर अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुती दी, भारतीय
साहित्य में इन वीरों का उल्लेख मिलता है। परन्तु कुछ ऐसे वीर या वीरों के
समूहों को नजरन्दाज भी कर दिया गया है, जिन्होने अपना सर्वस्य न्यौछावर कर
इस ऋषि भूमि की रक्षा की। रक्षा का भार वहन करने वालो को वैदिक वर्ण
व्यवस्था के अनुसार क्षत्रीय कहा गया। कालांतर में विभिन्न कारणो से
क्षत्रीय समूह अपने दायित्व से विचलित भी हुए परन्तु कुछ क्षत्रीय समूहों
ने अपने इस गुरुत्तर दायित्व से मुँह नही मोड़ा और उन्होने सदैव अपने
प्राणों की बाजी लगा कर देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा की। ऐसे क्षत्रीय
समूह को इतिहासकारों ने गुरुत्तर व गुर्जर के नाम से उल्लेखित किया है।
भारतीय इतिहास पर अनेक पुस्तकें भारतीय अथवा विदेशी इतिहासकारों व लेखकों
द्वारा लिखी गई, परन्तु अधिकांश ने गुर्जर जाति के कार्यो, बलिदानो व
क्षमताओं पर कुछ कहने का कष्ट नही किया। इतिहास इस बात का साक्षी है की
यदि 250 वर्षो तक अरब आक्रांताओं को गुर्जर वीर करारी चोट न देते तो
भारतीय संस्कृति पूर्णतः नष्ट हो जाती। इसी प्रकार तुर्क व अफगानो तथा बाद
में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गुर्जर वीरों ने विद्रोह न किया होता तो
भारतीय संस्कृति का स्वरूप कुछ ओर ही होता, भारत की आजादी के उपरान्त अगर
भारत की 556 रियासतों को गुर्जर वीर स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल एक झण्ड़े
तले न लाते तो वर्तमान भारत का संगठित स्वरूप दिखाई न देता।
इन सब बातों के होते हुए भी इतिहास की पुस्तकों से इस वीर देशभक्त
जाति का नाम समाप्त करने के पीछे इतिहासकारों का कोई भी उदेश्य रहा हो,
परन्तु दुसरी जो विशेष हानि हुई कि, गुर्जर जाति में हीन भावना का आगमन।
आदि काल से ही भारत भूमि पर भयंकर आक्रमण बाहर से होते रहें है, जिनमे
भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का हर सम्भव प्रयत्नों में कोई कमी नही
छोड़ी। चाहे यवनो, पार्थवो व लुटेरे अरबी या तुर्की हमलावरों के आक्रमण या
साम्राज्यवादी अंग्रेजो के, सभी ने भारतीय संस्कृति को समाप्त करने दौरान
कितनी भारी संख्या में जनसंहार हुआ होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती
है। नादिरशह व तैमुरलंग के खुनी कत्लेआम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो।
इतने संघर्षो व हमलो के बावजुद भारतीय संस्कृति आज भी दुनिया में गौरवमयी
रुप मेंदेखी जाती है। विश्व गुरु के रुप में जाना जाने वाला यह देश आज भी
अन्य देशो की तुलना में आदर्श देश है। जहाँ इस आर्थीक युग में भी
मर्यादयें जीवित है। इस संस्कृति के जीवित रहने कारणो में यदि हम गहराई
में जाऐ तो पता चलता है कि इसको जीवित रखने के लिए लाखो वीरों ने अपने
प्राणों की आहुती दी है। उन्ही के फलस्वरूप ही हम इस संस्कृति की गौरवमयी
शाया में आज भी समुचित स्तर पर है।
अपनी इस संस्कृति की रक्षा करने में जिन महानवीरों ने अपना बलिदान दिया
उनमें से कुछ का बिखरा बिखरा विवरण इतिहास में कुछ निष्पक्ष इतिहासकारों
ने किया है। फिर भी अधिकांश का उल्लेख एकत्रित रुप में नही मिलता है। वैसे
तो इस रक्षा समर में कई जातियो के वीर काम आए परन्तु प्रमुख भुमिका,
नेत्रत्व व वीरता जिन वीरों की रही उनमें से अधिकांश गुर्जर जाति से थे।
प्राचिन भारत का इतिहास देखें या वर्तमान भारत का, इस जाति के वीरों की
संख्या मुख्य रही है। जिन्होने अपने प्राणों बाजी लगा कर देश, धर्म व
संस्कृति की रक्षा की। देश की अखण्ड़ता के लिए इस जाति के वीर सदैव
प्रय्रत्नशील रहे है।
गुर्जर वीरों ने प्राचिन काल में अपनी भारतीय संस्कृति का प्रसार स्वदेश
की सीमाओ से बाहर अति सूदूर देशो में जा कर किया, जहाँ से लौट कर भारत,
अफगानिस्तान, ईरान, तिब्बत व मध्येशिया के विशाल भूखण्ड़ों को विजय कर के
महान कुशान साम्रज्य स्थापित कर सुख स्म्रद्धि का युग प्रारम्भ किया।
तत्पश्चात अपने जनेन्द्र साम्राट यशोधर्मा के नेत्रत्व में गुर्जर देश का
निर्माण किया। धर्मान्ध अरब आक्रांताओं को निरन्तर 250 वर्षो तक स्वदेश से
खदेड़ते हुए भारतीय धर्म व संस्कृति अभुतपुर्व सफलता के साथ रक्षा करते हुए
महान गुर्जर प्रतिहार साम्रज्य की स्थापित किया। फिर बाद में अपने सोलंकी
गुर्जर साम्राटो के नेत्रत्व में सदियो तक तुर्क आक्रांताओं को खदेड़ कर
स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा करते हुए अपना सर्वस्य न्यौछावर कर दिया।
परन्तु सत्ता विहिन होकर भी सदा विदेशी आक्रांताओं से टकराती रही और अन्त
में ब्रिटिश साम्राज्यवाद में सन 1822 से 1857 तक निरन्तर टकरा कर अपना
जन, धन, वैभव सब स्वाहा कर अति दीन अवस्था को प्राप्त हुई।
संघर्ष और स्वामिभक्ति की मिसाल: संघर्षशील
और जुझारू स्वभाव वाला गुर्जर समुदाय स्वामीभक्ति, दोस्ती और विश्वास की
रक्षा के लिए अपना जीवन न्यौछावर करने के लिए विख्यात है। अपने कहे पर
कायम रहने और उस पर खरे उतरे के मामले में गुर्जरों की विशेष ख्याति रही
है। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में अपनी
मातृभूमि के प्रति गुर्जर समुदाय के साहस, बहादुरी और वचनबद्धता की
भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इतिहास गवाह है कि अरब से आने वाले
आक्रमणकारियों को गुर्जरों ने लगातार 300 साल तक भारतीय सीमा में घुसने भी
नहीं दिया था।
1857 से जारी है गुर्जरों का संघर्ष: आरक्षण
के लिए गुर्जरों का राजस्थान में जारी आंदोलन भले ही एक साल पुराना माना
जा रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि उनका संघर्ष तो आजादी से काफी पहले
1857 से ही चल रहा है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने गुर्जरों को आपराधिक जाति
का दर्जा दे दिया था जिससे उत्तेजित होकर उन्होंने संघर्ष छेड़ दिया था।
1924 में गुर्जरों को फिर आपराधिक जाति कानून के तहत कड़े नियमों में
शामिल किया गया जिस कानून को 1951 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने समाप्त
कराया था। 1954 में अन्य जातियों को जनजाति वर्ग (एसटी) में शामिल कर लिया
गया लेकिन राजस्थान के गुर्जरों की तब भी उपेक्षा की गई। गुर्जरों को एसटी
में शामिल करने को लेकर पहला आंदोलन 1950 के अंत में शुरू हो गया था।
गुर्जरों ने राजस्थान में 1984 में पहली बार एसटी दर्जे की मांग की, इस
प्रस्ताव को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिव चरण माथुर ने यह कहकर नकार दिया कि
गुर्जर दूध के जरिये कमाने वाले किसान हैं। 1993 में गुर्जरों को ओबीसी की
सूची में शामिल किया गया। वर्ष 2000 में गुर्जरों को एसटी श्रेणी में
शामिल करने का आंदोलन शुरू हुआ।
गुर्जर: गुर्जरों
के उद्गम की जानकारी तो नहीं है लेकिन परंपरागत रूप से उनका संबंध
क्षत्रिय वर्ण से रहा है। हूणों के आक्रमण के समय उत्तर भारत में गुर्जर
चर्चा में आए। कुछ गुर्जरों का दावा है कि उनका संबंध चेचेन और जार्जिया
से है और जोर्जिया को परंपरागत रूप से गुजरिस्तान (जोर्जिस्तान) कहा जाता
था। कुछ का तो यह भी दावा है कि गुर्जर असल में जर्मन हैं। वैसे जोर्जिया
शब्द अरबी और फारसी के शब्द गुर्ज से बना है, गुर्जर से नहीं। इतिहास के
अनुसार गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी भीनमाल थी, जिसे गुर्जरों ने
स्थापित किया था। कुछ इतिहासकार ब्रज से भी इनका संबंध बताते हैं। कहते
हैं कि राधा के पिता राजा ब्रषभान भी गुर्जर थे। ब्रज में गुजरिया शब्द
गुर्जरों से ही आया।
नामी गुर्जरों में वल्लभ भाई पटेल भी:
देश के नामी गुर्जरों की बात करें तो देश को एकीकरण के सूत्र में पिरोने
वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम सबसे ऊपर है। उनके अलावा पूर्व
राष्ट्रपति स्व. फखरुद्दीन अली अहमद, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. राजेश
पायलट, उनके पुत्र सांसद सचिन पायलट, नामी शायर साहिर लुधियानवी, क्रिकेटर
अजहरुद्दीन, फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार और अर्जुन रामपाल भी गुर्जर हैं।